विशाखापत्तनम, फरवरी 2026। हिंद महासागर में सजे सैकड़ों युद्धपोत, आकाश में लहराते दर्जनों देशों के झंडे और तट पर उमड़ती भीड़ – यह नज़ारा केवल सैन्य ताकत का नहीं, बल्कि भारत की समुद्री कूटनीति के बढ़ते दायरे का संकेत होगा। एक ही शहर में इंटरनेशनल फ़्लीट रिव्यू (IFR) और बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास ‘मिलन’ का आयोजन, इंडो-पैसिफिक में भारत की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
2016 में विशाखापत्तनम के तट पर सत्तर से अधिक भारतीय और विदेशी युद्धपोतों की कतार लगी थी। दस वर्ष बाद, 2026 में यह आयोजन पहले से कहीं अधिक बड़ा और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होने जा रहा है। इस बार IFR के साथ-साथ अभ्यास ‘मिलन’ भी इसी शहर में होगा, जिसे भारतीय महासागर क्षेत्र के सबसे बड़े नौसैनिक जमावड़ों में गिना जा रहा है। कार्यक्रम के दौरान समुद्र में युद्धपोतों की सलामी के साथ शहर की सड़कों पर इंटरनेशनल सिटी परेड और उच्च स्तरीय समुद्री संगोष्ठी भी आयोजित की जाएगी।
बेड़ा निरीक्षण की परंपरा नई नहीं है। ब्रिटेन के स्पिटहेड रिव्यू से लेकर अमेरिका के ‘ग्रेट व्हाइट फ्लीट’ तक, नौसेनाओं ने अक्सर अपने जहाज़ों की कतारों के जरिए दुनिया को राजनीतिक संदेश दिए हैं। भारत ने भी 1953 में पहला राष्ट्रपति बेड़ा निरीक्षण आयोजित कर यही संकेत दिया था कि स्वतंत्र देश की नौसेना अब किसी वायसराय नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रपति को सलामी देगी। समय के साथ देशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत, नीलगिरी श्रेणी के स्वदेशी युद्धपोतों से लेकर कोलकाता श्रेणी तक, हर समीक्षा ने यह दिखाया कि भारत समुद्री शक्ति की सीढ़ियाँ लगातार चढ़ रहा है। 2001 में मुंबई के तट पर पहली अंतरराष्ट्रीय फ़्लीट रिव्यू और 2016 का विशाखापत्तनम IFR इसी यात्रा के मील के पत्थर हैं।
यदि IFR को नौसैनिक कूटनीति की ‘शोकेस विंडो’ कहा जाए, तो अभ्यास ‘मिलन’ को उसके ‘वर्कशॉप’ की तरह समझा जा सकता है। 1995 में पोर्ट ब्लेयर से शुरू हुआ यह अभ्यास, जहाँ शुरुआत में केवल पाँच देशों की नौसेनाएँ शामिल थीं, आज 40 से अधिक देशों के लिए साझा मंच बन चुका है। हाल के संस्करणों में मिलन ने जटिल समुद्री युद्धाभ्यास, समन्वित गश्त, और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) जैसे क्षेत्रों में वास्तविक परस्पर संचालन क्षमता विकसित की है। 2024 में 47 नौसेनाओं की भागीदारी और आईएनएस विक्रांत की मौजूदगी ने यह संकेत दिया कि भारत क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे में पसंदीदा सुरक्षा साझेदार बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
इंडो-पैसिफिक इस समय तेज़ सामरिक प्रतिस्पर्धा और जटिल सहयोग का केंद्र है। चीन की तेज़ी से बढ़ती नौसैनिक मौजूदगी, पाकिस्तान की निरंतर समुद्री सक्रियता और अमेरिकी नौसेना की प्राथमिकताओं का पुनर्संतुलन, क्षेत्रीय राज्यों के लिए असमंजस की स्थिति पैदा करता है। इसी बीच मालदीव से मॉरीशस और वियतनाम से इंडोनेशिया तक के तटीय देश समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ने और जलवायु-जनित आपदाओं जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ऐसे माहौल में भारत की ‘कन्वीनिंग पावर’ – तमाम देशों की नौसेनाओं को एक मंच पर बुला पाने की क्षमता – सबसे बड़ी ताकत उभरकर सामने आ रही है। IFR पारदर्शिता और विश्वास का संकेत देता है, वहीं मिलन वास्तविक अभ्यास और सम्मिलित संचालन के ज़रिए उस विश्वास को गहराई देता है। किसी भी उभरती शक्ति के लिए यह देखना ज़रूरी है कि कितने देश उसके बुलावे पर उसके ध्वज के नीचे इकट्ठा होने को तैयार हैं।
यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या इतने बड़े आयोजनों पर होने वाला खर्च उचित है। आलोचक इन्हें ‘महंगा तमाशा’ कहते हैं, लेकिन समुद्री शक्ति केवल जहाज़ों और पनडुब्बियों से नहीं, बल्कि साझेदारी, भरोसे और दृश्यता से भी बनती है। यदि भारत इन आयोजनों के समानांतर अपनी वास्तविक समुद्री क्षमता, दूरदराज़ जलक्षेत्रों में सतत मौजूदगी और घरेलू शिपबिल्डिंग ढाँचे को मजबूत करता रहा, तो IFR और मिलन जैसी पहलें दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखी जाएंगी। छोटी तटीय नौसेनाओं के लिए यह मंच न केवल प्रशिक्षण, बल्कि भारत के प्रति स्थायी सद्भाव का कारण भी बन सकता है।
फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम अंतरराष्ट्रीय फ़्लीट रिव्यू, अभ्यास मिलन और इंडियन ओशन नेवल सिंपोज़ियम (IONS) के चीफ़्स कॉन्क्लेव की मेज़बानी करेगा। समुद्र में कतारबद्ध युद्धपोतों से लेकर शहर की सड़कों पर निकलने वाली अंतरराष्ट्रीय परेड और कूटनीतिक बैठकों तक, हर स्तर पर दुनिया यह देखने की कोशिश करेगी कि भारत केवल शान-ओ-शौकत दिखा रहा है या वास्तव में क्षेत्रीय नेतृत्व की ओर बढ़ रहा है। IFR और मिलन जैसे आयोजन इंडो-पैसिफिक की शक्ति-संतुलन कहानी के महत्वपूर्ण अध्याय साबित हो सकते हैं।
Chat with Navika
India
Thailand
France
Iran
Bangladesh
Australia
South Africa
United Arab Emirates 

